कांगेे्रस-गाँधी और आरएसएस
गाँधी के विचारों, सिद्धान्तों, शिक्षाओं और मूल्यों को कांग्रेस ने कब का छोड़ दिया है। गाँधीवाद अब तो किताबों में भी देखने को नहीं मिलता है। कांग्रेस और उसके नेता गाँधी का नाम किस अधिकार से लेते है ? वे ना तो गांधी का अनुसरण करते है, बल्कि गाँधी की शिक्षाओं से ठीक विपरित आचरण करते है। इस नाम को यह लोग कब तक भुनायेगें यह कांग्रेस उस गाँधी को कब का पीछे छोड़ चुकी है। दूसरे पर राज करना, और अकूत धन संपति एकत्र करना, सत्ता में बने रहने के लिए आर्थिक-राजनैतिक षडयंत्र करना, कांग्रेस के नेतृत्व की पहचान बन गयी है। सत्ता की जिद में देश के शत्रुओं से भी गठबन्धन कर चुके हैं।कांग्रेस के नेताओं के व्यक्तव्यों से आम देशभक्त कांग्रेसी भी हैरान है। कांग्रेस का सिकुड़ता जनाधार अब कांग्रेस को राष्ट्र के सरंक्षक के रूप में नही देखता है। हिन्दू विरोधी दृष्टिकोण के कारण कांगे्रस के स्थाई वोट बैंक में कमी आयी है। राजस्थान में अभी हाल ही में हुये विश्वविद्यालयों के चुनावों में कांग्रेस की एनएसयूआई की करारी पराजय हुई है।
घटती हिन्दू जनसंख्या, हिन्दू देवी देवताओं, हिन्दू इतिहास पर सतत् प्रतिकूल टिप्पणियों से जनसामान्य स्तब्ध है। कंाग्रेस नेता धु्रवीकरण को बढावा देने की ओछी हरकतों पर उतर आये है। दुनिया भर के इस्लामिक देशों में अराजकता फैली हुई है। कांगे्रस भी सत्ता से वंचित होकर देश में अराजकता का वातावरण उत्पन्न करके दोष हिन्दुत्ववादी शक्तियों पर मढ़ना चाहती है। कांग्रेस का क्या यही गाँधीवाद है ?
अखण्ड भारत का स्वप्न देखने वाले आर.एस.एस. पर भारत तोड़ने का आरोप लगा कर इतरा रहे हैं। क्या कांग्रेस का अन्तिम पतन काल आ चुका है ? संघ पर अनेकों मिथ्या आरोप लगाये जाते रहे है। किन्तु संघ अरोपों का उत्तर दिये बिना मौन रहते हुए राष्ट्र सेवा में लीन है। ऐसी परिस्थिति में आधुनिक प्रचार तन्त्र रेडियो, टीवी, प्रिन्ट मिडिया, सिनेमा आदि का प्रयोग करके अपनी समाज तक पहुंचानी चाहिये। पर्याप्त तन्त्र के अभाव में अपने विरूद्ध होने वाले प्रोपोगेण्डा का प्रतिकार नही कर पा रहा है।
राहुल गाँधी ने संघ से जुड़े लोगों को गाँधी की हत्या का दोषी कहा था। यह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आर.एस.एस. पर आरोप लगाकर छवि घूमिल करने का प्रयास है। कानूनी दांव पेचों के कारण सुप्रीम कोर्ट से भले ही राहत मिल गयी, पर कंाग्रेस की छवि को जो क्षति हुई वह अपूरणीय है। यदि कोर्ट में पलटी ही मारनी थी तो गलत व्यक्तव्य देने की क्या आवश्यकता थी ?
जब आर.एस.एस. में गाँधी का वध नही किया तो ’’आर.एस.एस. के लोगों’’ पर आरोप का क्या तात्पर्य ? वधकर्ताओं के साथ आर.एस.एस. का नाम जोड़ने का अर्थ यही है कि संघ वध में शामिल है। तात्कालिक परिस्थितियों में कुछ गम्भीर और जिम्मेदार लोगों ने गाँधी का वध किया तो निश्चिित रूप से उनके पास स्तरीय कारण रहे होगें। किन्तु गाँधी की वास्तविक हत्या तो कांग्रेस ने की है। गाँधीवाद और गाँधी के मूल्यों को छोड़ा, और उसका नाम ’’बेच’’ कर देश का शोषण और दमन कर राज किया।
वे शक्तियाँ और विचार धारायें जिनका गुरूत्व केन्द्र भारत से बाहर है, उनके साथ साझेदारी में कांग्रेस ने अपनी रोटियँा सेकने के लिए भारत के मूल धर्म, सभ्यता, सास्कृंति परम्पराओं और महान इतिहास को नकारा है। चर्च, इस्लामिक जिहादियों और वामपन्थियों के हाथों सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करवाने का प्रयास किया है। इसीलिये राहुल गाँधी ने कहा कि आर.एस.एस. के खिलाफ उनकी लड़ाई कभी नहीं थमेगी। इसका तात्पर्य है भारत की मूल सभ्यता सांस्कृतिक को नष्ट करके राज करना ही उद्धेश्य है ?
संघ के सर संघसचंालक मोहन भागवत के हिन्दू जनसंख्या सम्बन्धित विचारा को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करके और अभद्र टिप्पणियाँ करके व्यर्थ की सुर्खियां तो बटोर ली ,किन्तु इस प्रयास में कांग्रेस समेत राष्ट्र विरोधी सेक्यूलर दलों की छवि को भारी क्षति हुई है। कांगे्रस के नेताओं ने गाँधी से यही सीखा है क्या ? राजनैतिक दल राष्ट्र विरोधी हो सकते है, किन्तु आम जनता राष्ट्रवादी ही है। इसीलिए जनसामान्य के संगठन आर.एस.एस. ने आज तक ऐसा कोई काम नही किया कि छवि को धक्का लगे।
संघ का विरोध करते करते कांगे्रसी कब देशद्रोही हो गये पता ही नही चला। कांग्रेस के नेता जब-तब पाकिस्तान पर बोल बोलते रहते है, राहुल गाँधी की दृष्टि में क्या यही सच्चा गाँधीवाद है ? गाँधी और कांग्रेस का आपस में कोई लेना-देना या साम्यता नही है। कंाग्रेस को अब गाँधी के बारे में बोलना छोड़ ही देना चाहिए।
संघ से जुडे लोगों ने गाँधी की हत्या एक बार की होगी। किन्तु कांग्रेसियों ने गाँधी की हत्या अनेकों बार की है। करोड़ो अरबों के घोटाले करने वाली कांग्रेस और उसके नेता, ना तो गाँधी के प्रतिनिधि है और ना ही उत्तराधिकारी ।
देश को धर्म के नाम पर बांट कर गुह युद्ध में धकेलने का प्रयास कर चुकी, साम्प्रदायिकता लक्षित हिसंा कानून जैसे काले कानून संसद में पारित करवाने का प्रयास करने वाली कांग्रेस का कौन सा नेता है, जो गाँधी के बताये रास्ते पर चलता है ? चूंकि संघ अपने आदर्शों से नीचे गिरकर कांगे्रस जैसे निम्न तल तक नही उतरता है। सेक्यूलर नेताओं की यही चिढ़ है।
कश्मीर, तिब्बत तथा चीन की समस्याओं को उलझाने वाले नेहरू खुद कभी गाँधी के सिद्धान्तों पर नहीं चले। 1947-48 में बलुचिस्तान के द्वारा मदद मांगी गयी थी जिस पर नेहरू ने ध्यान दिया होता तो आज युवाओं को एक बेहतर भारत रहने को मिलता।
अखण्ड भारत का स्वप्न देखने वाले मोहन भागवत पर आरोप लगाये जाते है कि वह सोते-जागते भारत को तोड़ने की सोचते है। वह कांग्रेस जिसने स्वयं देश को तोड़ा है, समाज को विभाजित किया है, किसी गांधी के साथ अपना नाम ना ही जोड़े।
देश को बेशर्मी से लूट कर खाने वाले कांग्रेस के नेता, संघ के मोहन भागवत पर आरोप लगाते है, कि धर्म का खाते है। तात्पर्य यह है कि देश में कांगे्रस, धर्म के खाने को भी हीन दृष्टि से देख, आलोचना करती है। कांगे्रस का वास्तविक गांधीवाद यही तो है।
धर्म का खाना हमारे लिए सम्मान जनक है। विदेशियों की बक्शीश पर पलना कांगे्रस के नेताओं के लिए गर्व का विषय है ? ऐसी समाज विरोधी गतिविधियों के कारण कांग्रेस, आम जनता की नजरों से उतर गयी है।
हिन्दुओं को यह बात समझनी होगी कि राजनैतिक स्वप्न का अभाव, राजनैतिक रूप से जागरूकता की कमी, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का अभाव, हिन्दू भविष्य को ले डूबेगा।
मनु त्रिपाठी
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